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🚩 🙏 जय 🌷 गुरु 🙏 🚩  भगवान् के नाम के आगे 108 की संख्या का तात्पर्य :                            दो सप्ताह पहले एक गीता पाठ श्रोता ने  प्रश्न किया - माला में भी 108 जाप होते हैं और भगवान् के नाम के पहले भी 108 लिखा जाता है। क्यूँ?     कुछ विद्वानों ने कुछेक मत प्रकट किये  गूगल से भी कुछ उत्तर मिले, परंतु मैं संतुष्ट ना हो पाया। आज सुबह एक मंदार आश्रम में कथा कर रहे विद्वान से फोन पर बात हुई वह न्यूमेरोलॉजी के आधार पर कुछ नया बोले।    मैं फिर भी सतुष्ट नहीं हो पाया।.            स्नान करते वक्त बाबा की अद्भुत कृपा से जो विचार आया वह नीचे लिख रहा हूँ।   :-                                         108 तीन अंकों की संख्या है।         पर भगवान् के संबोधन में तीनों ही का अलग अलग महत्व होता है।.              1 :- एक मैं ही हूँ और कुछ नहीं.            0 :-  मैं पूर्ण हूं, पर कहीं भी नहीं दिखता हूं, (पूर्णस्य पूर्ण  मादायः पूर्णंएवायः वशिष्यते)                          8 :-     अषट् दल कमल  —         यानी हनुमान (प्राण) के हृदय में मेरा वास है, वही मेरा पता है।. हनुमानजी की भी संख्या 8 है। यान
श्रीहरिः।। मीरा बाईसा के  आखिरी पल:- ---------------------------------------- द्वारिकाधीश की मंगला आरती हो चुकी थी और पुजारी जी द्वार के पास खड़े थे। दर्शनार्थी दर्शन करते हुये आ जा रहे थे ।राणावतों और मेड़तियों के साथ मीरा मंदिर के परिसर में पहुँची ।मीरा ने प्रभु को प्रणाम किया । पुजारी जी मीरा को पहचानते थे और उन्हें यह विदित था कि इन्हें लिवाने के लिए मेवाड़ के बड़े बड़े सामन्तों सहित राजपुरोहित आयें है ।चरणामृत और तुलसी देते हुये उन्होंने पूछा -" क्या निश्चित किया ? क्या जाने का निश्चय कर लिया है ? आपके बिना द्वारिका सूनी हो जायेगी ।"  " हाँजी महाराज ! वही निश्चित नहीं कर पा रही !! अगर आप आज्ञा दें तो भीतर जाकर प्रभु से ही पूछ लूँ !!!"  " हाँ हाँ !! पधारो बा !! आपके लिए मन्दिर के भीतर जाने में कोई भी बाधा नहीं !!!"-पुजारी जी ने अतिशय सम्मान से कहा। पुजारी जी की आज्ञा ले मीरा मन्दिर के गर्भगृह में गई ।ह्रदय से प्रभु को प्रणाम कर मीरा इकतारा हाथ में ले वह गाने लगी........ मीरा को प्रभु साँची दासी बनाओ। झूठे धंधों से मेरा फंदा छुड़ाओ॥ लूटे ही लेत विवेक का
जय जगन्नाथ तुलसीदास जी का अनुभव तुलसीदास जी अपने इष्टदेव का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी गये ।मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर प्रसन्नमन से अंदर प्रविष्ट हुए ।जगन्नाथ जी का दर्शन करते ही निराश हो गये ।विचार किया कि यह हस्तपादविहीन देव हमारा इष्ट नहीं हो सकता । बाहर निकल कर दूर एक वृक्ष के तले बैठ गये ।सोचा कि इतनी दूर आना ब्यर्थ हुआ ।क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है? कदापि नहीं । रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था । अचानक एक आहट हुई ।वे ध्यान से सुनने लगे । अरे बाबा ! तुलसीदास कौन है? एक बालक हाथों में थाली लिए पुकार रहा था । तभी आप उठते हुए बोले --'हाँ भाई ! मैं ही हूँ तुलसीदास ।' बालक ने कहा, 'अरे ! आप यहाँ हैं ।मैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूँ ।' बालक ने कहा -'लीजिए, जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है ।' तुलसीदास बोले --'कृपा करके इसे बापस ले जायँ। बालक ने कहा, आश्चर्य की बात है, 'जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ' और वह भी स्वयं महाप्रभु ने भेजा और आप अस्वीकार कर रहे हैं ।कारण? तुलसीदास बोले
 The significance of the Rathyatra and its spiritual analogy :      A huge celebration all over the world  is the "Rathyatra" रथयात्रा festival. Hundreds of thousands of people participate  and enjoy. The essence of such Sanatan Dharm (हिन्दू धर्म) is mostly lost even to the revellers /participants. A question from Nick Picciani from the USA 🇺🇸 a participant on my weekly on - line talk  "SANATAN Science of Living" got me thinking. Ultimately to make double sure I checked with Gurudev Murli Panda Baba as well. What emerged is narrated below :-- The Rathyatra is the wonderful story of beautifully celebrating the journey of life and rebirth. The rath (chariot) - signifies the human body,                   Lord Shri Krishn (Jagannath) is the Kutashth, soul (सगुण ब्रम्ह) present in all beings and rides this chariot (body)   Called NANDIGHOSH (the exclamation of blissful Joyen by Daruk (the Devdar-tree of the devatas) the charioteer             Subhadra  is निवृति (niva
🌻🙏मेरा  धन 🚩🌻🙏 🌻🙏एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा करता। एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये।  🌻🙏सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार चले गये।  🌻🙏भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये।  🌻🙏पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारा बच्चे कितने हैं?  सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं। 🌻🙏महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है? उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं। 🌻🙏महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये।  🌻🙏मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे। पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं ? सेठ जी ने कहा महाराज! मेरा एक पुत्र है।   🌻🙏महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता है सेठ जी झूठ बोल रहे हैं। इसकी पत्नी तो कहती थी कि हमारे चार बच्चे हैं और हमने स्वयं भी तीन-चार बच्चे आते
                                                                  मुक्ति  जो जीते जी मुक्त रहा है सच कहूँ तो मरने के बाद भी वही मुक्त हो सकता है। जो यहाँ नहीं मुक्त रहा वो वहाँ कैसे मुक्त रहेगा? मुक्त रहने का मतलब सब छोड़-छाड़ कर भाग जाना नहीं होता। ये मुक्ति का स्वरूप नहीं है।  आप सबसे पहले ये विचार करिए आप अपनी चेतना में क्रोध से कितने मुक्त हैं? आप काम से कितना मुक्त हैं? आप लोभ से कितना मुक्त हैं? ये सब जरूरी है पर ये आपके कन्ट्रोल में है या आप इनके कंट्रोल में है?  जो अभी मुक्त है वो सदैव मुक्त है।  मुक्त व्यक्ति का स्वभाव क्या है? he never react he always respond. हम अपने जीवन में सदैव रिएक्ट करते रहते हैं respond नहीं करते। कोई पूछ ले- रो क्यों रहा है? वो रुला गया। हँस क्यों रहा है? वो हँसा गया। सो क्यों रहा है? वो सुला गया। जग क्यों रहा है? वो जगा गया। हमारा जीवन ऐसा है हम जिससे मिलते हैं उसके सामने अपना रिमोट रख देते हैं तू बटन दबा। वो दबाता है प्रशंसा का बटन तो यहाँ लग जाता है प्रसन्नता का चैनल। वो दबाता है निंदा का बटन तो यहाँ तुम भी आग बबूला हो जाते हो।  भाई तुम्हारा टीवी
 एक सेठ जी थे, जो दिन-रात अपना काम-धँधा बढ़ाने में लगे रहते थे। उन्हें तो बस, शहर का सबसे अमीर आदमी बनना था। धीरे-धीरे ही सही पर आखिरकार वे नगर के सबसे धनी सेठ बन ही गए। इस सफलता की ख़ुशी में उन्होने एक शानदार घर बनवाया। गृह प्रवेश के दिन, उन्होने एक बहुत शानदार पार्टी का आयोजन किया। जब सारे मेहमान चले गए तो वे भी अपने कमरे में सोने के लिए चले आए। थकान से चूर, जैसे ही बिस्तर पर लेटे, एक आवाज़ उन्हें सुनायी पड़ी.. मैं तुम्हारी आत्मा हूँ और अब मैं तुम्हारा शरीर छोड़ कर जा रही हूँ ! सेठ घबरा कर बोले, अरे ! तुम ऐसा नहीं कर सकती , तुम्हारे बिना तो मैं मर ही जाऊँगा। देखो, मैंने वर्षों के तनतोड़ परिश्रम के बाद यह सफलता अर्जित की है। अब जाकर इस सफलता को आमोद प्रमोद से भोगने का अवसर आया है। सौ वर्ष तक टिके, ऐसा मजबूत मकान मैने बनाया है। यह करोड़ों रूपये का, सुख सुविधा से भरपूर घर, मैंने तुम्हारे लिए ही तो बनाया है! तुम यहाँ से मत जाओ।      आत्मा बोली, "यह मेरा घर नहीं है, मेरा घर तो तुम्हारा शरीर था, स्वास्थ्य ही उसकी मजबूती थी, किन्तु करोड़ों कमाने के चक्कर में, तुमने इसके रख-रखाव की अवहे